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Saturday, 9 May 2020

मेरा घर, मेरा शहर भोपाल Hindi Story


119/41 शिवाजी नगर के उस दो मंजिले सरकारी क्वार्टर की निचली मंजिल पर हमारा घर था जहाँ मेरा जन्म हुआ। घर के सामने लगे नीलगिरी और गुलमोहर के पेड़ों, और आँगन में लगे कनेर, जंगली मेहंदी, बोगनवेलिया की बेल और तारों की बागड़ के पास लगी बेशरम की झाड़ियों की छाँव में बचपन पलने लगा। जब बड़ी होती गयी तो आसपास लगे अमलतास और कचनारों से भी पहचान हुई, दोस्ती हुई।

ये वो वक्त था जब रात में खुली खिड़कियों से जुगनू घर में आ जाया करते थे और बचपन बड़े कौतूहल से कमरे में उड़ते उन नन्हे-नन्हे टिमटिमाते दीयों को देखते हुए न जाने कब सपनों की दुनिया में पहुँच जाता था। जब भी पिताजी रात में कंधे पर बिठाकर घूमने ले जाते छः नम्बर के पास बहते नाले पर उड़ते असंख्य जुगनुओं को दीपदीपाते देख आँखे अचंभित रह जाती। तब आसमान में ढेर सारे तारे होते और धरती पर उतनी ही संख्या में जुगनू। भाई और चाचा अपनी शर्ट की जेब में जुगनू भर लाते जो रात के अंधेरे में उनकी जेबों में चमकते और दादाजी की डांट खाते हुए आजाद किये जाते।


बुआ के घर की छत पर खड़े होकर देर शाम तक पंछियों के झुंडों को अपने नीड़ों की ओर लौटते देखना शाम का सबसे प्रिय खेल हुआ करता था। तोते, चील, बगुले, कबूतर कितने तो पँछी थे तब जो रोज शाम को सर पर से सर्र से उड़ते जाते और मैं अपने भाई-बहनों के साथ उन्हें हाथ हिलाकर यूँ विदा करती जैसे कि वे मुझे पहचानते हो और प्रत्युत्तर में पँख फड़फड़ाकर मुझे भी "टाटा" करते।



शहर भर की घनी हरियाली जब इतनी ठंडक देती थी जितनी आज घर में लगे पाँच-पाँच एयरकंडीशनर भी नहीं दे पाते। मेन रोड और लिंक रोड के दोनों तरफ लगे घने पेड़ जब बारहों महीने झूमते रहते थे अपने नैसर्गिक सौंदर्य में। तब सौंदर्यीकरण के नाम पर कांट-छाँट नहीं थी। प्रकृति अपने मूल रूप में, अपने नैसर्गिक सौंदर्य के साथ फलती-फूलती थी। उसकी बेतरतीबी में ही कितनी अनघड़ सुंदरता थी। जैसे अपने प्राकृतिक मार्ग पर बहती वेगवती नदी की धारा में अपना एक स्वाभाविक सौंदर्य होता है। 

रात आँगन में खुले आसमान तले दादाजी सप्तऋषियों से पहचान कराते। ये वो वक्त था जब मेरे शहर की ठंडी हवाओं में निश्चिंतता की थपक थी। कुल्फी वाले कि घण्टियों की मधुर धुन गलियों में गूँजती। जब तारों वाली टूटी बागड़ से घिरे आँगन भी सुरक्षित थे और रात भर गहरी नींद सुलाते थे। अब रात में घर का हर दरवाजा देखना पड़ता है कि कुंडी, ताला ठीक से लगा है कि नहीं।

मेरे शहर में तब मुहल्ले थे जो बागड़ के तार उठाकर एक दूसरे के आँगन में आते-जाते रहते थे। गलियाँ लड़कों के क्रिकेट के शोर से आबाद रहती थी तो आँगन बेटियों के पायल की रुनझुन से। तब रिश्ते घर की चारदीवारी में कैद नहीं थे। खो गया है मेरा वो पुलियाई रिश्तों वाला शहर इन अंग्रेज कॉलोनियों के सॉफिस्टिकेटेड आचरण में। वैसे ही जैसे कॉन्वेंट स्कूल की टाई बंधी, इस्त्री की हुई लकदक यूनिफॉर्म में किसी बच्चे की सारी मासूमियत घुटकर रह जाती है।


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